क्रिया,क्रिया किसे कहते हैं,क्रिया की परिभाषा

क्रिया (Verb)

● परिभाषा :

वैसे शब्द जो किसी कार्य के किए जाने या होने का बोध कराएँ, उन्हें क्रिया कहते हैं।

जैसे- (i) मीरा नाच रही है।

(ii) सुमन पढ रहा है।

(ii) चीता तेज दौड़ता है।

ऊपर दिए गए वाक्यों में “नाच रही है”, “पढ़ रहा है”, “दौड़ता है” आदि शब्द किसी न किसी कार्य के करने या होने का बोध कराते हैं। अतः ये क्रिया

शब्द हैं।

धातु: क्रिया के मूलरूप को धातु कहते हैं। दूसरे शब्दों में क्रिया के किसी भी रूप में जो अंश समान रूप से मिले वही धातु हैं।

जैसे

सामान्य रूप                       धातु रूप

जाना                                   जा

चलना                                  चल

गाना                                     गा

दौड़ना                                   दौड़

● क्रिया के भेद :

1. कर्म के आधार परः

कर्म के आधार पर क्रिया के दो भेद होते हैं : (क) अकर्मक क्रिया : जिन क्रियाओं को कर्म की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें अकर्मक क्रिया कहते हैं। ऐसी क्रियाओं का फल सीधे कर्त्ता पर पड़ता है।

जैसे- (i) बच्ची रोती है।

       (ii) राम हँसता है।

       (iii) वह सो रहा था।

 अन्य अकर्मक क्रियाएँ- खेलना, डरना, होना, बढ़ना, जाना, घटना, पढ़ना, आदि ।

(ख) सकर्मक क्रिया : जिन क्रियाओं के प्रयोग में कर्म की आवश्यकता होती है, उन्हें सकर्मक क्रिया कहते हैं। इन क्रियाओं का फल सीधे कर्म पर पड़ता है।

जैसे- (i) मैं खाना बना रही हूँ।

       (ii) राम ने पत्र लिखा।

ऊपर दिए गए उदाहरणों में ‘बना’, ‘लिखा’, क्रियाएँ क्रमशः ‘खाना’ तथा ‘पत्र’ कर्मों के लिए प्रयुक्त हुई हैं। इसलिए ये सकर्मक क्रियाएँ हैं।

2. प्रयोग के आधार पर क्रिया के भेद :

 प्रयोग के आधार पर क्रिया के पाँच भेद होते हैं :

(i) सामान्य क्रिया : जब केवल एक ही क्रिया का प्रयोग हो, तब वह सामान्य क्रिया कहलाती है।

जैसे- तुम आए। वह गया।

(ii) संयुक्त क्रिया : जब दो या दो से अधिक क्रियाएँ एक साथ प्रयुक्त होती हों, तब वे संयुक्त क्रिया कहलाती हैं।

जैसे- मुन्ना चलने लगा। विवेक जा चुका है।

(iii) नामधातु क्रिया : जो क्रिया-पद, संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों से बने हों, उसे नामधातु क्रिया कहते हैं।

जैसे

संज्ञा शब्दों से          : शर्म- शर्माना, बात – बतियाना ।

सर्वनाम शब्दों से       अपना अपनाना।

विशेषण शब्दों से।       गर्म – गर्माना, दुख – दुखाना।

(iv) प्रेरणार्थक क्रिया : जिन क्रियाओं से यह ज्ञात हो कि कर्त्ता स्वयं कार्य न करके किसी दूसरे को उसे करने की प्रेरणा देता है, तो उन्हें प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं। जैसे- मोहन, सोहन से कहानी लिखवाता है।

इस वाक्य में ‘लिखवाना’ प्रेरणार्थक क्रिया है। यहाँ मोहन ‘प्रेरक कर्त्ता’ तथा सोहन ‘प्रेरित कर्त्ता’ है।

(v) पूर्वकालिक क्रिया : यदि क्रिया के पहले किसी अन्य क्रिया का प्रयोग हो, तो वह पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है। जैसे- मैं अभी-अभी खाकर उठा हूँ। आज मैं तुम्हें नाचकर दिखाऊँगा ।

विशेष : पूर्वकालिक क्रियाएं, धातु रूप के अंत में ‘कर’ अथवा ‘करके’ लगाकर बनाई जाती हैं या क्रिया के सामान्य रूप में प्रयुक्त होती हैं।

जैसे- (i)अतिथि फल खाकर जाएँगे।

        (ii) हरि जहर पीते ही मर गया।

        (ii) गणेश पुस्तक पढ़कर हँसने लगा।

        (iv) वह पुस्तक पढ़कर स्कूल जाएगा।

● क्रिया के दो विशेष रूप :

(1) अपूर्ण क्रिया : कभी-कभी किसी वाक्य में क्रिया के होते हुए भी उसका अर्थ अस्पष्ट ही रहता है। ऐसी क्रियाएँ अपूर्ण क्रिया कहलाती हैं ।

जैसे- (i) जवाहरलाल नेहरू थे।

        (ii) मैं हूँ ।

इन वाक्यों में ‘पूरक’ शब्द लगाकर इनके अर्थ को स्पष्ट किया जाता है।

जैसे- (i)जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे।

       (ii)मैं होशियार हूँ।

(2) द्विकर्मक क्रिया : जब कोई क्रिया दो कर्मों के साथ प्रयुक्त होती हैं,तो वे द्विकर्मक क्रिया कहलाती हैं।

जैसे- प्राचार्य ने रमेश को पुरस्कार दिया।

इस वाक्य में ‘दिया’ क्रिया का फल ‘रमेश’ और ‘पुरस्कार’ दोनों कर्मों पर पड़ रहा है। अतः ‘दिया’ यहाँ एक द्विकर्मक क्रिया है।

  • ध्यान रखें कि द्विकर्मक क्रियाओं में ‘क्या’ और ‘किसे’- इन
  • दोनों प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है।

अभ्यास

1. क्रिया किसे कहते हैं? उदाहरण देकर स्पष्ट करें।

2. क्रिया कितनी प्रकार की होती हैं ? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण दें।

3. अकर्मक तथा सकर्मक क्रियाओं में अंतर स्पष्ट करें।

4. निम्नलिखित क्रियाओं के तीन-तीन उदाहरण लिखें।

    (i) संयुक्त क्रिया

     (ii) नामधातु क्रिया

     (iii) पूर्वकालिक क्रिया ।

Read more

2 thoughts on “क्रिया,क्रिया किसे कहते हैं,क्रिया की परिभाषा”

Leave a Comment